ग्वालियर। प्रदेश शासन लोक सेवा गांरटी अधिनियम को लागू करने पर अपनी पीठ थपथपा रहा है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग में इस अधिनियम का कितना पालन हो रहा है इसका पता राज्य बीमारी सहायता निधि के प्रकरणों को देखकर चलता है। पिछले 10 माह में लोक सेवा अधिनियम के तहत सिर्फ 7 प्रकरण आए हैं। योजना के बारे में आम जनता को जानकारी नहीं है, इसलिए लोग इसके लाभ से वंचित हैं।
लोक सेवा गारंटी अधिनियम मप्र शासन द्वारा वर्ष 2010 में लागू किया गया था। इस अधिनियम में स्वास्थ्य योजनाओं को शामिल नहीं किया गया। लेकिन वर्ष 2011 में शासन ने राज्य बीमारी सहायता के तहत 1 लाख रुपए तक के प्रकरण, विकलांगता प्रमाण-पत्र जारी करना एवं दीनदयाल अंत्योदय उपचार योजना के कार्ड जारी करने के कार्य को लोक सेवा गांरटी अधिनियम में शामिल कर लिया। इन कायरें को समय सीमा में निपटाने के दिशा-निर्देश जारी किए गए। लेकिन इसके बाद भी स्वास्थ्य विभाग में लोक सेवा गांरटी अधिनियम पूरी तरह से क्रियान्वित नहीं हो सका है। पिछले 10 माह में राज्य बीमारी सहायता निधि के 7 प्रकरण आना, इस योजना की पोल खोल रहे हैं।
संबंधित अधिकारी का कटता है वेतन
लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत अगर कार्य समय सीमा में पूरा नहीं किया गया, तो संबंधित अधिकारी के वेतन से कटौती की जाएगी। कार्य जितना देरी से होगा, अधिकारी का उतने दिन का वेतन काटेगा।
इनका कहना है
लोक सेवा गांरटी अधिनियम शासन की बेहद महत्वपूर्ण योजना है। इसका प्रचार-प्रसार किया जाना आवश्यक है। अगर स्वास्थ्य विभाग द्वारा ऐसा नहीं किया जा रहा तो संबंधित अधिकारियों से इसकी जानकारी ली जाएगी। जहां तक कम प्रकरण आने की बात है, तो अधिकारियों से इस बारे में भी चर्चा करेंगे।
नरोत्तम मिश्रा, स्वास्थ्य मंत्री, मप्र