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अजयमति माताजी ने त्यागा अन्न
On 7/22/2012 7:10:13 PM

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भोपाल। शतायु की ओर बढ़ रहीं अजयमति माताजी ने अचानक समाधि लेने का मन बना लिया है। हालांकि उन्होंने अपने उम्र के 93 पड़ाव पार कर लिए हैं। मूलत: चैनकुंवर के नाम से जानी जाने वालीं अजयमति माताजी अब क्षुल्लिका बन गई हैं। उन्होंने समाधि लेने की इच्छा व्यक्त करते हुए अन्न भी त्याग दिया है। इस दौरान शंकराचार्य नगर स्थित दिगंबर जैन मंदिर में मुनिश्री सुबल सागर महाराज ने अजयमति माताजी को संलेखना की दीक्षा प्रदान की। अब मात्र उनको मठा और उबला पानी ही दिया जा रहा है।

17 जुलाई को हुई थी दीक्षा

अजयमति माताजी की दीक्षा की प्रक्रिया 17 जुलाई को मुनि सुबल सागर महाराज के सानिध्य में पूरे विधि-विधान के साथ करवाई गई। इस अवसर परखासी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे। मंदिर परिसर में प्रतिदिन माताजी के दर्शन करने दूर-दूराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु आते हैं।

माताजी व उनके परिवार ने किया आग्रह

अजयमति माताजी व उनके परिवार के सदस्यों ने स्वयं जाकर मुनिश्री सुबल सागर महाराज से दीक्षा देने का आग्रह किया था। दीक्षा प्राप्त करने के बाद माताजी ने अपना घर, परिवार, अन्न त्याग दिया अब वह मंदिर में सिर्फ ईश्वर का ध्यान कर रही हैं।

संलेखना का उद्देश्य

मंदिर के प्रवक्ता प्रवीण जैन के अनुसार जैन संस्कृति के अनुसार जिस व्यक्ति का घर, परिवार और समाज से मोह हट जाता है वह ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग खोजने लगता है। यही प्रक्रिया जैन धर्म में संलेखना कही जाती है और संलेखना के मार्ग से मोक्ष की प्राप्ति करता है। इसको समाधि मरण भी कहा जाता है।

दो बार पहले भी हो चुकी संलेखना

इससे पहले राजधानी में दो बार संलेखना हो चुकी है। टीटी नगर स्थित दिगंबर जैन मंदिर में लगभग पांच साल पहले एकत्वमति माताजी की संलेखना हुई थी। वहीं काफी साल यानि लगभग 45 साल पहले संलेखना हुई थी।

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