प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति का चुनाव जीत लिया। वह चमत्कार नहीं हुआ, जिसके भरोसे उनके प्रतिद्वंद्वी पीए संगमा उनके विरुद्ध चुनाव लड़ रहे थे। दरअसल, पीए संगमा बार-बार यह संदेश देते रहे थे कि वे दलित हैं और अल्पसंख्यक यानी ईसाई। उन्हें लगता था कि इन वर्गो के तमाम सांसद-विधायक उन्हें वोट दे सकते हैं और चूंकि मतदान गोपनीय होता है और कोई पार्टी किसी प्रत्याशी को वोट देने के लिए न तो अपने सांसदों-विधायकों को निर्देश दे सकती है और न ही उन पर किसी दूसरे ढंग से दबाव डाल सकती है, लिहाजा चमत्कार हो सकता है, जो कि हुआ नहीं। सच भी यह है कि यूं तो कोई भी चुनाव चमत्कारों के भरोसे नहीं जीता जाता, फिर राष्ट्रपति का चुनाव तो बिलकुल ही नहीं। यह चुनाव उस दल के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता है, केंद्र में जिसकी सरकार होती है। अत: आजाद भारत में ऐसा कभी नहीं हुआ, जब केंद्रीय सत्ता के न चाहने के बावजूद कोई व्यक्ति राष्ट्रपति बना हो।
एक बार कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी तो जरूर चुनाव हार गए थे, पर तब, जब तब की प्रधानमंत्री इंदिराजी ने उन्हें हराया था। उसके पहले व उसके बाद फिर कभी ऐसा नहीं हुआ, तो इस बार कैसे होता? प्रणबदा के पक्ष में वोटों का गणित भी एकदम साफ था। आंध्रप्रदेश के चंद्रबाबू नायडू मतदान से दूर रहने का ऐलान कर चुके थे। देर से ही सही, मगर दुरुस्त आकर ममता बनर्जी ने भी प्रणबदा को समर्थन देने का ऐलान कर दिया था और यदि यह भी नहीं होता, तो भी प्रणबदा की जीत पक्की ही थी। हां, चंद्रबाबू और ममता दादा के विरोध में चले जाते, तो हार -जीत का अंतर कम हो सकता था, पर जीतते प्रणबदा ही।
उनका व्यक्तित्व है भी कमाल का। जिस व्यक्तित्व के चक्कर में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में तो फूट पड़ी ही, उस वाममोर्चा में भी फूट पड़ गई थी, जिसके चारों दल आपस में यूं गड्डमड्ड थे, जैसे दूध में पानी हो जाता है। तब प्रणबदा को कमजोर मानने की भूल कर भी कौन सकता था। चूंकि वर्तमान दौर गठबंधन की राजनीति का है, इस दौर में कुछ अप्रत्याशित हो जाने की आशंका निरंतर बरकरार रहती है, इसीलिए तो कांग्रेस ने प्रणबदा को चुनाव लड़ाया है, क्योंकि ये सभी दलों में बहुत सम्मान की नजरों से देखे जाते हैं। दूसरे दलों के कई नेताओं से उनके गहरे संबंध हैं। दादा सिर्फ लोकप्रिय ही नहीं हैं, बल्कि विद्वान और दूरदर्शी नेता भी हैं। उन्हें इन सभी का फायदा मिला है और देश को यह फायदा मिला है कि प्रणब मुखर्जी जैसा व्यक्तित्व उसका राष्ट्रपति बना।
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