भोपाल। जब तमाम विभाग हाईटैक होकर पेपरलैस हो चुके हैं, तब भी नगर निगम में जनहित से जुड़े हर काम कछुआ चाल से निपटाए जा रहे हैं। यूं तो निगम ने बिल्डिंग परमिशन में तत्परता दिखाने के बड़े-बड़े दावे किए हैं, लेकिन आलम यह है कि दो नगर निवेशकों के बजाय एक ही अफसर होने से भवन अनुज्ञा की फाइलों का अंबार लगता जा रहा है। वैसे भी सीपी इस मामले में जरूरी अधिकारों से वंचित बताए जा रहे हैं। बताते हैं कि 15 सौ वर्गफीट का अधिकार सहायक यंत्री को है और इसके बाद फाइलें आयुक्त तक जाती हैं। दिलचस्प बात यह है कि सीपी को मुख्यालय में भी समय देना जरूरी है, किंतु वे नए शहर का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं।
सूत्र बताते हैं कि लगभग डेढ़ से दो साल पहले तक निगम की भवन अनुज्ञा शाखा में दो सीपी हुआ करते थे। जिसमें एक को नए और एक को पुराने भोपाल की जिम्मेदारी दी गई थी। लोगों की भवन अनुज्ञा से संबंधित समस्याओं का निदान अपने-अपने क्षेत्रों में ही हो जाता था, लेकिन इसके बाद से भवन अनुज्ञा शाखा में एक ही सीपी श्री मुदगल की नियुक्ति की गई, जिन्हें पूरे भोपाल की जिम्मेदारी दे दी गई थी। श्री मुदगल की विदाई के बाद अमित गजभिये भवन अनुज्ञा में बतौर सीपी का दायित्व निभा रहे हैं। श्री गजभिये की नियुक्ति के बाद से तो बिल्डिंग परमिशन शाखा का निजाम ही बदल गया है। उनका मुख्यालय से ऐसा मोह भंग हुआ है कि उनके पास पुराने शहर के लोगों से मिलने तक का वक्त नहीं है। किसी को भी इनसे मिलना हो तो नए भोपाल स्थित कार्यालय में जाना पड़ता है। सीपी अपना अधिकांश वक्त नए भोपाल स्थित कार्यालय में बिताते हैं।
पता चला है कि यहां भी उनके इर्द-गिर्द बड़े बिल्डरों का जमावड़ा लगा रहता है। इंतजार करते हैं लोग-इधर सदर मंजिल स्थित भवन अनुज्ञा शाखा के मुख्यालय में शहरवासी समस्याओं के समाधान को लेकर नगर निवेशक का इंतजार करते-करते थककर अंतत: अपने घर का रास्ता पकड़ लेते हैं। इनमें से कई लोग तो अपनी शिकायतों को लेकर आने वाले हैं जबकि कई मांगे गए जवाब देने के लिए आते हैं। सीपी की अनुपस्थिति से कार्यालय में होने वाला कार्य भी प्रभावित हो रहा है। यहां कई मामलों के निराकरण संबंधी फाइलें भी लंबे समय तक पड़ी रहती हैं। कई कार्य तो ऐसे हैं जो बेवजह लेट किए किए जा रहे हैं।
दलाल हावी, परेशान जनता
भवन अनुज्ञा शाखा में दलाल हावी हैं। निगम परिषद की बैठक में यह मामला जमकर गुंजा था। जिसमें कांग्रेस पाषर्द ने बिल्डिंग परमिशन में दलाली का गंभीर आरोप लगाया था। पाषर्द का कहना था कि निगम कर्मचारी ही इस दलाली के काम को अंजाम दे रहे हैं। भवन अनुमति को लेकर जो दलालों की जेबों को भर देता है, उसका काम चुटकियों में हो जाता है और जो जेब ढीली नहीं करते हैं उसके काम महीनों तक अटके रहते हैं। तीन-तीन माह तक लोगों को भवन अनुमति नहीं दी जाती है। इस दौरान भवन अनुमति को लेकर समय सीमा निर्धारित करने की बात भी उठाई गई थी।