भोपाल। जब मेडिकल छात्रों को मानव शरीर पर परीक्षण करने का मौका ही नहीं मिलेगा तो यह कैसे संभव है कि वह एक बेहतर चिकित्सक बन सकेंगे। गांधी मेडिकल कॉलेज, होम्योपैथी एवं आयुर्वेद कॉलेज में छात्रों को मृत शरीर पर प्रयोग करने का अवसर नहीं मिल रहा है। जबकि हमीदिया में हर माह दो से तीन लाशें लावारिस मिलती हैं। इनके मृत शरीरों को जीएमसी के एनाटामी विभाग में सुरक्षित रखा जाता है, ताकि मेडिकल छात्रों को मृत शरीर पर प्रयोग करने के लिए किसी तरह की परेशानी न हो, लेकिन पिछले दो सालों से इन लावारिस लाशों का पता ही नहीं चल रहा है कि यह कहां चली जाती हैं।
सूत्र बताते हैं कि राजधानी में इस समय निजी मेडिकल कॉलेजों में भी छात्र अध्ययनरत हैं। पहले केवल शासकीय गांधी मेडिकल कॉलेज था और कहीं से भी मिलने वाली लावारिस लाश जीएमसी को ही सौंपी जाती थी। मचरुरी भी केवल हमीदिया अस्पताल में है। इससे लावरिस लाश के पीएम के लिए भी इन्हें यहीं भेजना चाहिए, लेकिन पिछले छह माह से एक भी लावारिस लाश जीएमसी के एनाटामी विभाग में नहीं आई हैं। यहां इस वर्ष छात्रों के परीक्षण के लिए आठ मृत शरीर रखे हैं। जो एमबीबीएस के प्रथम वर्ष के छात्रों को कम पड़ेंगे। यही स्थिति राजधानी के अन्य निजी मेडिकल कॉलेजों की भी है। लिहाजा लाशों की सौदेबाजी से इनकार नहीं किया जा सकता है।
दानदाताओं की कमी फिर भी चलाते हैं काम
जीएमसी एनाटामी विभाग की अध्यक्ष डॉ. आशा श्रीवास्तव कहती हैं कि यह सही है कि छात्रों की संख्या के पेक्षाकृत मृत शरीर कम हैं फिर भी हम काम चला लेते हैं। पिछले छह महीने से लावारिस लाश भी नहीं आई हैं। इधर दानदाताओं की भी कमी है। क्योंकि अब शहर में तीन-चार मेडिकल कॉलेज हैं, लोग अन्य मेडिकल कॉलेजों को भी अपना मृत शरीर दान कर रहे हैं।
लावारिस लाशों का यह खेल
हमीदिया अस्पताल, टीबी अस्पताल एवं अन्य जगहों पर मिलने वाली लावारिस लाशों का भी इस समय खेल चल रहा है। कई दलाल निजी मेडिकल कॉलेजों में लावारिस लाश देने के लिए इसकी तलाश में रहते हैं कि इन लाशों को उठाकर वह मेडिकल कॉलेज में खासी रकम में बेच देते हैं। बताया जा रहा है कि हमीदिया में कई लोग सामाजिक संस्था के नाम पर इन लाशों को जलाने, दफनाने के लिए पहुंचते हैं, लेकिन इन्हें वास्तव में कहां ले जाया जाता है इसका कोई पता नहीं चलता है।
150 छात्रों पर आठ लाशों की जरूरत
मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के मापदंडों के अनुसार अधिक से अधिक 15 मेडिकल छात्रों पर एक शव परीक्षण के लिए होना चाहिए। इस मान से मेडिकल कॉलेजों में लाशें पर्याप्त होना चाहिए। जहां तक दान की लाशों का सवाल है तो एक साल में एक भी दान की लाश किसी मेडिकल कॉलेज को प्राप्त नहीं हुई है। फिर इन कॉलेजों में कौन सी लाशें पहुंच रही हैं और कैसे?