टीम अन्ना द्वारा राजनीतिक पार्टी बनाने और फिर अन्ना हजारे द्वारा टीम अन्ना भंग कर देने की खबर से राजनीति के गलियारों में कहीं जश्न का माहौल है, तो कहीं लोग गम के सागर में गोते लगा रहे हैं। गम में डूब जाने वाले वे लोग हैं, जो जनता के बीच यह भ्रम फैला रहे थे कि टीम अन्ना उनके साथ और वे टीम अन्ना के साथ हैं। अब ये लोग हैरान हैं। इन्हें लगने लगा है कि अन्ना यदि अपनी राजनीतिक दुकान खुद खोलकर बैठ गए, तो इनका क्या होगा? भाई साहब, इन लोगों की स्थिति यह है कि इनमें से कई लोग प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब दिन में ही देख रहे थे। न सूत का कहीं पता था और न ही धागे का, फिर भी जुलाहे आपस में गुत्थम-गुत्था हो रहे थे। अब इन्हें लगता है कि कहीं ऐसा न हो कि अन्ना हजारे की राजनीतिक पार्टी के कारण इनका प्रधानमंत्री बनने का सपना धूल में मिल जाए! फिर भी, ये अन्ना की पार्टी का स्वागत कर रहे हैं। और कोई रास्ता भी तो नहीं!
इधर, जो लोग जश्न में डूबे हुए हैं, उनका चिंतन अलग प्रकार का है। मंत्रियों के चेहरों पर जो चमक आई है, उसका बखान नहीं किया जा सकता। चमक आए भी क्यों न! अन्ना हजारे और उनकी टीम के बार-बार के आंदोलन से पीछा जो छूटा! अब ये लोकपाल बनाएंगे या नहीं बनाएंगे, ये इनकी मर्जी। लोकपाल के लिए कान पकड़ने वाला अब कोई नहीं है। 42 साल से तो लोकपाल लटका हुआ ही है, कुछ दिनों के लिए अब वह फिर लटक गया है। इनके लिए इससे बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है!
भाई साहब, हमारे समाजसेवक जिस चीज से सबसे ज्यादा डरते हैं, वह लोकपाल ही है। दरअसल, लोकपाल से इनकी समाज सेवा में बाधा उत्पन्न होगी। अभी स्थिति यह है कि दिल्ली से जो एक रुपया चलता है, वह नीचे पहुंचते-पहुंचते इतना घिस जाता है कि जब वह अपने ठौर पर पहुंचता है, तो सिर्फ 15 पैसे बचता है। यानी, 85 पैसे बीच में कहीं उड़ जाते हैं और ये 15 पैसे वाला आंकड़ा भी ताजा नहीं, बल्कि करीब 25 वर्ष पुराना है। तब राजीव गांधी ने संसद को इस महान आंकड़े की जानकारी दी थी। जाहिर है कि समय बहुत गुजर चुका है। युग पौने दो लाख करोड़ के टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले का चल रहा है। अत: अब एक रुपए में से पांच-छह पैसे ही नीचे पहुंचते होंगे! लोकपाल अगर बन जाएगा, तो इन लोगों को नीचे पहुंचने वाले पैसों की तादाद बढ़ानी होगी।
फिलहाल यह तादाद बढ़ाने का डर अब दूर हो गया है। अव्वल तो लोकपाल बनेगा ही नहीं और अगर बनेगा भी, तो वह ऐसा होगा कि किसी दफ्तर के कोने में चुपचाप अपनी जगह बैठा रहेगा! जिन लोगों को इतनी सुविधा मिल गई हो, वह खुश तो होंगे ही। मगर, अन्ना ने अपनी टीम को भी निराश कर दिया है। दरअसल, यह टीम अब भंग हो गई है। इस टीम के नाम पर भाई लोगों ने अपने चेहरे जमकर चमकाए। इस हद तक कि जिन्हें कोई नहीं जानता था, उन्हें पूरा देश जानने लगा। भ्रष्टाचार आज अपनी ताकत पर मुस्करा रहा होगा, क्योंकि वह बहुत समझदार है। वह जानता है कि पार्टी बना लेना आसान काम है, जबकि सत्ता में आना बहुत कठिन!
-- एसएस
‘मानसी’ |