उपराष्ट्रपति के चुनाव में डॉ. हामिद अंसारी की जीत को देख यही कहा जा सकता है कि यह तो होना ही था। यह तो सही है कि उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन मतलब, एनडीए व खासतौर पर भाजपा, प्रत्याशी घोषित करते वक्त वैसी असमंजस में तो नहीं रही थी, जैसी कि राष्ट्रपति चुनाव में प्रणब मुखर्जी के खिलाफ उम्मीदवार की घोषणा के मामले में थी। उसने वक्त रहते अपने कद्दावर नेता जसवंत सिंह को मैदान में उतार दिया था और इसका उसे फायदा भी मिला। यह फायदा ही है कि राष्ट्रपति के चुनाव में जो एनडीए बिखर गया था, उसके दो घटक दल शिवसेना और जेडीयू प्रणबदा के पक्ष में चले गए थे, वही एनडीए उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए एकजुट हो गया था। इसके बाद भी संख्याबल चूंकि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के पक्ष में साफ-साफ था, इसीलिए जसवंत सिंह की हार व यूपीए के प्रत्याशी हामिद अंसारी की जीत भी लगभग पक्की ही थी। यानी, यह परिणाम दरअसल किसी भी दृष्टि से अप्रत्याशित नहीं।
याद रखें कि डॉ. हामिद अंसारी को इस पद पर दूसरा मौका मिला है, जो कि उनके लिए व्यक्तिगत गौरव की बात है। इसलिए कि दूसरी बार उपराष्ट्रपति बनने का मौका उनसे पहले केवल और केवल महान शिक्षाविद् तथा दार्शनिक सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन को ही मिला था। वैसे, उल्लेखनीय यह भी है कि डॉ. अंसारी का पहला कार्यकाल कोई बहुत प्रशंसनीय नहीं रहा था। उपराष्ट्रपति का संवैधानिक दायित्व सिर्फ यह होता है कि वह संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं। इससे बाहर कोई भूमिका निभाने का मौका उपराष्ट्रपति को बहुत कम मिलता है, तो यह तो याद रखना ही होगा कि उनके कार्यकाल में राज्यसभा में मॉर्शल तक का इस्तेमाल हुआ था, जो कि सही नहीं था।
फिर, वर्ष-2011 के अंत में राज्यसभा में जब लोकपाल पर बहस हो रही थी, तब उन्होंने रात 12 बजे समय का हवाला देकर सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया था, जो सही फैसला नहीं माना गया। वैसे सच यह भी है कि उनकी जगह कोई दूसरा उपराष्ट्रपति होता, तो वह भी सदन को स्थगित ही करता, तो भी जो गलत था, वह गलत था। उम्मीद है कि डॉ. हामिद अंसारी अपने इस दूसरे कार्यकाल में ऐतिहासिक भूमिका निभाएंगे। उन्हें मौका भी तो आखिर डॉ. राधाकृष्णन की तरह मिला है। उम्मीद तो यह भी है कि अगली बार उनको राष्ट्रपति बनने का अवसर भी मिलेगा। उपराष्ट्रपतियों को प्राय: यह मौका मिलता रहा है।
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