देश की अर्थव्यवस्था के सामने जो बुरी नौबत इस वर्ष आई है, वैसी कम ही मौकों पर आती है। एक तरफ सूखा है, तो दूसरी तरफ बाढ़। जहां कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान और उड़ीसा में सूखे के कारण खरीफ की फसलों की बुआई तक नहीं हो पाई है, तो वहीं उत्तरप्रदेश के कुछ इलाकों समेत हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, असम और मध्यप्रदेश में बाढ़ ने भी कहर ढाना शुरू कर दिया है। अपने प्रदेश की तमाम नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं और आलम यह है कि करीब चार सौ गांवों में जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। प्रदेश में बारिश देर से शुरू हुई थी, इस कारण बहुत-सी फसलें नष्ट हो गई थीं। जो कमी रह गई थी, वह बाढ़ या भारी बारिश ने पूरी कर दी है। लगता नहीं है कि खरीफ की फसल से किसानों को अब कोई उम्मीद बची भी होगी। यह स्थिति उन किसानों के लिए ज्यादा खतरनाक है, जिन अन्नदाताओं ने कर्जा लेकर फसल की लागत जुटाई होगी। इससे हमारी सरकार तो दोहरे संकट में फंस ही गई है। एक तो उसे बाढ़ पीड़ित जनता का पुनर्वास करना होगा, तो दूसरे उन किसानों को भी राहत देनी ही होगी, जिनकी फसल बर्बाद हो चुकी है।
दोहरा संकट केंद्र सरकार के सामने भी है। उसे सूखा पीड़ित राज्यों की अलग मदद करनी होगी, तो बाढ़ पीड़ित राज्यों की भी। उत्तराखंड में बाढ़ से छह सौ करोड़ का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया है। इसकी भरपाई केंद्र को ही तो करनी है। इधर, बाढ़ और सूखे की इस मिली-जुली आपदा के कारण चूंकि खेती पर बुरा प्रभाव पड़ा है, लिहाजा खाद्य पदार्थो की कीमतें आगे और भी बढ़ने वाली हैं। यानी, इस आपदा का जितना असर किसानों और सरकारों पर पड़ना है, उतना ही आम जनता पर भी। अब केंद्र व सभी राज्य सरकारों को चाहिए कि वे इस बुरी स्थिति से निपटने के प्रयास अभी से प्रारंभ कर दें, ताकि वह बेकाबू न हो।
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