कुछ बड़बोले लोग कभी-कभी यह कह उठते हैं कि अपने देश में न्यायपालिका कुछ ज्यादा ही सक्रिय है, मगर सरकारें जब अपना फर्ज नहीं निभाती हैं, तो आखिर न्यायपालिका क्या करे? तब उसे सरकारों के कान उमेठने ही पड़ते हैं। भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने में रखे हुए जहरीले कचरे का मामला भी कुछ ऐसा ही है। भोपाल में दिसंबर-1984 में हुआ था, गैस कांड। तब से अब तक 28 वर्ष बीत चुके हैं। 28 वर्ष का समय कम नहीं, बहुत ज्यादा होता है, मगर हमारी राजनीतिक बिरादरी की संवेदन-शीलता और प्रशासन की कुशलता की पोल खोलने वाली कहानी यह है कि यूनियन कार्बाइड का जहरीला कचरा अब भी जहां का तहां रखा हुआ है। ये लोग 28 साल से बस कचरे को उठवाने का
अदालत को लगा होगा कि कचरे के निष्पादन के लिए जर्मनी के राजी हो जाने के बाद भी इस मामले में हमारी सरकारें ढुलमुल रवैया अपनाएंगीं। अत: उसने गुरुवार को इस कार्य के लिए एक समय-सीमा भी निर्धारित कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व मध्य-प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि यूनियन कार्बाइड के कचरे का निष्पादन छह महीने के भीतर हो ही जाना चाहिए। लिहाजा, उम्मीद है कि भोपाल को इस जहरीले कचरे से छुटकारा अब मिलेगा ही। इस प्रयास के लिए सुप्रीम कोर्ट की सराहना होनी चाहिए, तो उन लोगों की निंदा भी, जो यह जरूरी काम अदालत के डर से कर रहे हैं। ये तो कर्तव्यनिष्ठ तभी माने जाते, जब गैस-कांड के साल -छह महीने बाद ही जहरीले कचरे का निष्पादन करा देते।
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