अंकगणित के छात्र इस चक्कर में थे कि टेलीकॉम घोटाले के 1.76 लाख करोड़ को लिखने के लिए कितने शून्य लगाने होंगे कि महालेखा परीक्षक (कैग) ने कोयला घोटाला निकाल दिया, जो 1.80 लाख करोड़ का बताया जाता है। वहीं, सिविल एविएशन मंत्रलय का करोड़ों का घोटाला भी सामने आ गया। चूंकि यूपीए-दो, खासतौर पर कांग्रेस भ्रष्टाचार व महंगाई के आरोपों से निहायत परेशान है। ऐसे में घोटालों पर घोटाले उजागर होना उसके लिए कोढ़ में खाज के समान हैं। अत: कांग्रेस का किलपना स्वाभाविक है। सो, उसके प्रवक्ता मनीष तिवारी ने, जिनकी बॉडी लैंग्वेज व वाणी विनम्रता से परे है, कैग को ही निशाने पर ले लिया। उन्होंने एक ओर तो कैग को लक्ष्मण रेखा न लांघने का मशवरा दे डाला, तो दूसरी ओर तीखा व्यंग्य किया कि कैग शून्य पर शून्य लगाने की आदत छोड़े। इस पूरी स्थिति को भावनात्मक नजरिए से न देखकर विषय-परक दृष्टि से देखने की आवश्यकता है।
कैग एक संवैधानिक संस्था है। उसका काम जनता के पैसे के सदुपयोग पर कड़ी नजर रखना है। यदि उसे लगता है कि स्पेक्ट्रम या कोयले की नीलामी से ज्यादा आय हो सकती थी, जो नहीं हुई, तो वह इसे सरकारी पैसे की हानि निरुपित करने के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार की यह आपत्ति तो वाजिब है कि उसके नीति निर्धारण के अधिकार को मात्र एकाउंटेंसी की नजर से देखकर स्पेकुलेटिव लॉस निकालना गलत है। उसका यह कथन भी सही है कि जिन 57 कोयला ब्लॉकों का आवंटन किया गया, उनमें से मात्र एक में ही काम हुआ है, शेष 56 ब्लॉकों को निरस्त करने की कार्रवाई चल रही है, लेकिन सरकार की इस सफाई में एक पेंच है।
जब सरकार ने स्वयं नीलामी का फैसला ले लिया था और संबंधित सचिव ने भी बारंबार यही कहा, तो उसे निरस्त करने के पीछे क्या रहस्य है? सरकार की यह दलील किसी के गले उतरना मुश्किल है कि यदि नीलामी में कोयला महंगा बिकता, तो बिजली आम आदमी को महंगी पड़ जाती। चूंकि इस प्रकरण में स्वयं प्रधानमंत्री का नाम आ रहा है, जो कि उस समय कोयला-प्रभारी थे। अत: कांग्रेस और भी बौखला गई है। बौखलाने से संयम खो जाता है और ऐसी टिप्पणियां आती हैं कि कैग शून्य पर शून्य न लगाए। इस पूरे प्रकरण को संसदीय गरिमा व सामूहिक जवाबदेही की भावना से देखना जरूरी है। कार्यपालिका की नीयत और निष्क्रियता यदि शून्य निर्मित करेगी, तो उसे भरने के लिए अन्य संवैधिानिक संस्थानों को शून्य-दर-शून्य लगाने ही होंगे।
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