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विपक्ष को कालिख नहीं देखनी चाहिए
On 9/6/2012 10:00:51 PM

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साधो, हमने ऐसा कौन-सा गुनाह कर दिया, जो पहले नहीं किया था! इसके लिए संसद को ठप करना कहां तक उचित है! हमारे चमकते हुए काले मुखड़े पर अगर तुम्हें कालिख दिखाई पड़ रही है, तो यह तुम्हारी दृष्टि का दोष है, हमारा नहीं। कालेपन से हमारा पुराना रिश्ता रहा है, इसलिए हमें कहीं कालिख नजर आती है, तो हम उससे परहेज नहीं करते। काले-गोरे के भेद ने दुनिया को पहले भी कई बार बांटा है। रंग-भेद इस दुनिया की प्रमुख समस्याओं में से एक रहा है। अब ये विपक्ष वाले भी विभाजन की वैसी ही राह पर चलते दिखाई पड़ रहे हैं। वे चेहरा देखते हैं, मन नहीं, जो कि एकदम साफ-सुथरा है। लगता है कि विपक्ष वालों की आंखें कमजोर हैं। उनमें अंदर तक झांकने की क्षमता नहीं रही, अब। इसीलिए बात का बतंगड़ बना रहे हैं।

हमने कोयले की दलाली में जान-बूझकर हाथ काले किए हैं। अगर न करते, तो कहावत झूठी साबित नहीं हो जाती! यह हमारा फर्ज है कि हम पुरानी कहावतों और मुहावरों को झूठा साबित न होने दें। इसीलिए हमारा शुक्रिया अदा करो कि हमारे हाथ ही काले हुए हैं, चेहरा-मोहरा नहीं। आज के जमाने में चेहरे को बेदाग बचा ले जाना कम बड़ी बात नहीं, क्योंकि कालिख का पहला प्रहार हमेशा चेहरे पर ही होता है। यानी, अपना चेहरा बचाने की कूवत सबके भीतर नहीं पाई जाती है कि वे इस निर्लज्ज समय में अपने व पार्टी के चेहरे को दागदार होने से सुरक्षित रख सकें। हमने यह कर दिखाया। इसके लिए हमें नोबल पुरस्कार दिया जाना चाहिए। मगर, विपक्षी हैं कि संसद को सिर पर उठाए घूम रहे हैं।

हमने कोयले की खदान में जाने वालों को पहले ही व्हिप जारी कर दिया था कि वे वहां जाएं, तो दस्ताने पहन लें, लेकिन उन्होंने पार्टी के निर्देशों का अनुपालन नहीं किया, जिससे उनके हाथों में कालिख लग गई। उनमें से कुछ लोग फंस भी गए हैं, बेचारे। सीबीआई ने उनको अपने लपेटे में ले लिया है। अगर वे हमारी बात मान लेते, तो उन्हें आज यह दुर्दिन देखने को नहीं मिले होते। समय रहते यदि वे कालिख को पार्टी के स्टोर में रखे नैतिकता के डिटर्जेट से धो डालते, तो सब कुछ छिप जाता, लेकिन विपक्षियों की बुरी नजर ऐसी लगी कि उन्हें कालिख दिखाई पड़ ही गई।

हम कहते हैं कि वे हमारी कालिख को देखते ही क्यों हैं? विपक्ष स्वयं मन का काला है, इसलिए वह हमेशा दूसरों की कालिख देखता और तलाशता रहता है। इतने वर्ष सरकार से बाहर रहकर भी जब उसके भीतर राजनीतिक संस्कार नहीं पनपे, तो अब क्या खाक पैदा होंगे! अब तो वे जीवन भर कालिख ही देखते और झेलते रहेंगे। कालिख में फंसकर बाहर आना सबके बस की बात नहीं। गांधीजी ने कहा था कि पाप से घृणा करो, पापी से नहीं। ये विपक्षी गांधीजी के भी विरोधी हैं। उन्हें मानते होते, तो क्या हमसे नफरत करते? क्या हमारी कालिख देखते? विपक्ष यह क्यों नहीं सोचता कि आज हम जहां हैं, कल वे भी उसी जगह हो सकते हैं। आज तुम जब हमारी कालिख देख रहे हो, तो कल हम तुम्हारी कालिख भी देखेंगे। अत: मान भी जाओ और कालिख देखना बंद करो।

-- सुधीर विद्यार्थी

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