सारनी। एमपीईबी की जमीन पर बेसमेंट और अवैध अतिक्रमण मामले में सिविल विभाग ने एक पखवाड़े से अधिक समय गुजार दिया, लेकिन अतिक्रमण नहीं तोड़ा। खासबात यह है कि सिविल की इसी लापरवाही से बांस-टट्टे की गुमठियों ने पक्के निर्माण का रूप धारण कर लिया है।
सिविल पर भारी अतिक्रमणकारी के हौसले का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि मेन शॉपिंग सेंटर में बेसमेंट और अवैध निर्माण पर अभी तक कोई आंच नहीं आई। जबकि हाल फिलहाल में एमपीईबी की जमीन पर ही बरादरी में आलीशान मकान भी खड़ा हो गया है। इन अतिक्रमणों पर रियायत का ही नतीजा है कि दूसरे अवैध अतिक्रमण शुरू हो गए है। गायत्री मंदिर के पीछे रातो रात अतिक्रमणकारी ने लाल ईटों से पक्का निर्माण खड़ा कर दिया। यहां पहले बांस-टट्टा लगाकर एमपीईबी की जमीन में गुमठी बनी थी।
सिर्फ औपचारिकता निभाई
इसे पक्के अतिक्रमण में बदल दिया गया, लेकिन सिविल विभाग ने ठोस कार्रवाही नहीं की और केवल 18 सितम्बर को गायत्री मंदिर के पीछे चल रहे अवैध निर्माण की एक दीवार तोड़कर औपचारिकता निभा दी। इसी दीवार को पुन: बनाकर अतिक्रमणकारी ने पक्की दुकान का निर्माण कर लिया। ऐसे में सवाल यह है कि सिविल विभाग अतिक्रमण तोड़ने यानि अपने कार्यनिष्ठता के प्रति गंभीर क्यांे नहीं है ? अतिक्रमण हटाने शासन या पुलिस प्रशासन का सहारा क्यों नहीं लिया जा रहा। यदि सिविल अतिक्रमण के विरूद्ध कठोर कदम उठाता है और अतिक्रमण के लिए इस्तेमाल रॉ-मटेरियल जब्त करने और अतिक्रमण तोड़ने में होने वाले व्ययों का भुगतान भी कब्जेधारियों से वसूल करता है तो संभवत: अतिक्रमण के अवैध जाल पर विराम लग सकता है।
कार्यप्रणाली संदेहस्प्रद
अतिक्रमण के खिलाफ सिविल विभाग का ठंडा रवैया उसकी कार्यप्रणाली को संदेहस्प्रद बना रहा है। नोटिस के बावजूद अतिक्रमण का सलामत रहना और अवैध निर्माण न टूटना इस बात को स्पष्ट करता है कि सिविल विभाग खुद अतिक्रमण को तोड़ने के प्रति गंभीर नहीं है। यदि सिविल विभाग का ढीला रवैया अवैध निर्माणों पर इसी तरह कायम रहा तो आने वाले समय में सैकड़ांे अतिक्रमण एमपीईबी की जमीन पर नजर आने लगेंगे।
सख्ती की जगह चापलूसी
एमपीईबी की जमीन पर अवैध अतिक्रमण को बढ़ावा मिलने के पीछे सिविल विभाग का ढ़ुलमुल रवैया सबसे बड़ा कारण है। विभाग अतिक्रमण के खिलाफ सख्त नहीं है। इससे अतिक्रमणकारियों के हौंसले बढ़ गए है। सिविल अधिकारियों की इन्हीं लारपवाही के चलते शहर में साल दो साल में दो सौ से अधिक दुकानें अतिक्रमण कर बन चुकी है। इतना ही नहीं कई अतिक्रमण तो एमपीईबी क्वाटरों के ईदगिर्द भी देखा जा सकता है।
साठ-गांठ का मामला तो नहीं
अतिक्रमण को तोड़ने के प्रति सिविल अधिकारियों की धीमी रफ्तार सांठ-गांठ को जाहिर करने लगी है। अतिक्रमण का मामला मुख्यालय जबलपुर तक पहुंचने के बाद भी प्लांट के सिविल अधिकारियों ने अभी तक कोई ठोस या कठोर कार्रवाही को अंजाम नहीं दिया है।
अतिक्रमण और अवैध बेसमेंट यथावत है। सिविल ने दुकान के निर्माण का मेजरमेंट तक नहीं लिया। ताकि अतिक्रमण वाले हिस्से को चिन्हित कर तोड़ने की कार्रवाही प्रारंभ हो सके। इससे स्पष्ट है कि सिविल विभाग केवल मामले को शांत होने की राह ताक रहा है जो सिविल अधिकारियों और अतिक्रमणकारियों की सांठ-गांठ जैसे संदेहस्प्रद स्थिति को जन्म देने लगा है।