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संपादकीय

चीन का डर अपनी जगह एकदम सही

By Raj Express | Publish Date: 3/20/2017 11:15:21 AM
चीन का डर अपनी जगह एकदम सही

उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों की धमक वैसे तो पूरी दुनिया में सुनी जा रही है, पर चीन में इसकी अनुगूंज कुछ खास ही है। चीन का मीडिया इतना भयभीत है कि उसके द्वारा लगातार टिप्पणियां की जा रही हैं कि भारत में भाजपा की ताकत बढ़ने से दोनों देशों के संबंधों में और भी तनाव फैल सकता है। चूंकि नरेंद्र मोदी के साथ उनके देश की जनता है, सो वे अब झुकेंगे नहीं। पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आने के फौरन बाद इस तरह की टिप्पणी ग्लोबल टाइम्स ने की थी, जबकि अब यह टिप्पणी पीपुल्स डेली ने की है। समाचार चैनल सीसीटीवी पर बाकायदा इस विषय पर बहस कराई जा चुकी है कि हिंदुस्तान में मोदी की बढ़ती ताकत चीन के लिए नुकसानदायक हो सकती है या फिर फायदेमंद? उस बहस में यह प्रश्न भी उठाया गया था कि अगर इससे चीन को नुकसान होगा तो कितना? वैसे चर्चा करने वाले पैनल में शामिल तीनों लोग-चीन के रणनीतिक संस्थान के उपप्रमुख लाई जे चिंग, सामारिक मामलों के ज्ञाता हू हंतोईन और विदेश नीति के जानकार ली वुन यू इस एक तथ्य पर सहमत थे कि चीन एक बड़ी ताकत है, इसलिए वह भारत पर कूटनीतिक या अन्य तरह के दबाव बनाकर उसे अपने पक्ष में कर लेगा, लेकिन इन तीनों में इस बात पर भी सहमति थी कि स्थिति चीन के लिए विपरीत होती जा रही है और उसका काम कठिन हो गया है। बहरहाल, यह तो हम जानते ही हैं कि भारत एवं चीन के बीच बहुत सारे विवाद हैं। सबसे बड़ा विवाद सीमा को लेकर है। अभी हाल ही में चीन ने कहा था कि भारत तवांग उसे दे दे, तो चीन भी अक्साई चिन उसे देने पर विचार कर सकता है। हमारे अरुणाचल प्रदेश पर भी वह आए दिन दावा करता रहता है। वास्तविकता यह है कि भारत व चीन की पूरी सीमा ही विवादित है। यह विवाद भी हमने नहीं, चीन ने खड़ा किया है। हम मैकमोहन रेखा को चीन व भारत की सीमा के रूप में मान्यता देते हैं, जबकि वह इसे मानता ही नहीं। एक विवाद तो यही है, दूसरा विवाद समुद्र में है। बीते दो दशकों से चीन हिंद महासागर में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है एवं दक्षिण चीन सागर में जो विवाद है, वह हमें उसका भी एक पक्ष मानकर चलता है। उसकी यह धारणा गलत भी नहीं है। हम इस मामले में चीन के रुख का समर्थन नहीं करते। हमारा यह रुख सही है। वियतनाम, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया, जापान व मलेशिया का भी दक्षिण चीन सागर पर अधिकार है और हम इसे मान्यता देते हैं। चीन को हमारा यह रुख ठीक नहीं लगता है। वह यह बात समझना ही नहीं चाहता कि अंतरराष्ट्रीय विवाद वैश्विक कानूनों के जरिए ही हल हो सकते हैं, दादागीरी के जरिए नहीं। यूं यह बात हम खुलकर नहीं कहते, लेकिन उसे डर है कि हिंदुस्तान की वर्तमान सरकार की ताकत बढ़ेगी, तो वह यह बात कह सकती है कि चीन को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करना होगा।

इधर, पाकिस्तान को लेकर तो उसका रवैया विवादित रहता ही है। हमारी आपत्तियों के बावजूद वह कश्गर-ग्वादर परियोजना से पीछे नहीं हटा है, जबकि यह व्यापारिक गलियारा पाक-अधिकृत कश्मीर से होकर जा रहा है, जो कि भारत का हिस्सा है और जिस पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है। गिलगित और बाल्टिस्तान को पाकिस्तान पूर्ण राज्य का दर्जा देने की तैयारी में है और निश्चित ही इसके पीछे भी चीन की शह होगी। अभी गिलगित एवं बाल्टिस्तान स्वायत्त क्षेत्र है। मतलब, उसकी अपनी निर्वाचित सरकार होती है एवं वहां पाकिस्तान का संविधान नहीं चलता। बेशक, इस इलाके की स्वायत्तता तो पाकिस्तान ने लगभग समाप्त ही कर दी है, फिर भी संवैधानिक दृष्टि से वह स्वायत्त ही है। अब अगर पाकिस्तान उसे पूर्ण राज्य बना देता है तो यह उसकी हठधर्मिता ही होगी और चीन ऐसा ही चाहता है। उसके साथ हमारा एक और विवाद यह है कि चीन भारत में दलाई लामा और तिब्बत की अस्थाई सरकार को बर्दास्त नहीं करता। यह कैसी कूटनीति है कि भारत तो अपने यहां एक संत को जगह नहीं दे सकता है, जबकि चीन पाकिस्तान के आतंकवादियों का बचाव करता है। बताने की जरूरत नहीं है कि मौलाना मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध सिर्फ और सिर्फ चीन के कारण नहीं लग पा रहे हैं। इस तरह से कह सकते हैं कि चीन और भारत के बीच बहुत सारे गंभीर विवाद हैं। इनमें एक नया विवाद यह भी जुड़ गया है कि भारत ने अभी हाल ही में उस ताइवान के सांसदों को अपने यहां आने दिया था, जिसे चीन अपना हिस्सा मानता है, उस पर कब्जा करना चाहता है। यही सब वे विवाद हैं, जिनका समाधान चीन अपने हिसाब से करना चाहता है और अब उसके मीडिया को लगने लगा कि चूंकि भारत में बीजेपी की ताकत बढ़ गई है, इसलिए मोदी सरकार अब उसके दबाव में नहीं आएगी। गौरतलब है कि चाहे सीसीटीवी हो और चाहे ग्लोबल टाइम्स और पीपुल्स डेली जैसे अखबार, इनका संचालन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी करती है। यानी, ये सरकारी हैं, इसीलिए ये जिस डर को व्यक्त कर रहे हैं, वह इनका नहीं, बल्कि चीन की शी जिनपिंग सरकार का डर है। आगे मोदी का रुख तय करेगा कि चीन का डर वास्तविक है अथवा अवास्तविक।

डॉ.डीबी कुंभज (अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकार)

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