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इंदौर

बेटी मौत के मुहाने, नहीं मिल रहे मुफ्त इंजेक्शन

By Raj Express | Publish Date: 3/20/2017 12:35:13 PM
बेटी मौत के मुहाने, नहीं मिल रहे मुफ्त इंजेक्शन

इंदौर। एमवायएच कहने को भले ही गरीबों का अस्पताल है, लेकिन जब तक वह कागजों में गरीब न हो, तब तक उसे मुफ्त इलाज नहीं मिलता। एक ऐसी ही लड़की इन दिनों एमवायएच की इमरजेंसी यूनिट में मौत के मुहाने पर खड़ी हो, मौत से जूझ रही है, लेकिन उसे अस्पताल से जीवन रक्षक कहे जाने वाले महंगे इंजेक्शन नहीं मिल रहे हैं।पहला कारण अस्पताल में इन इंजेक्शन का स्टाक नहीं है। दूसरा कारण गरीब बच्ची की मां के पास दीनदयाल डायरी नहीं है। तीसरा बड़ा कारण उसके पास ठीक ढंग से खाने के रुपए नहीं है, तो वह कैसे महंगे इंजेक्शन खरीदेगी। 

खून की कमी से फट गई हैं आतें: सपना (24 वर्ष) जिसके पिता की मौत दुर्घटना में हो चुकी है। मां दिहाड़ी मजदूरी करती है। छोटे भाई हैं, लेकिन बेरोजगार। ऐसे गरीब परिवार की सपना को खून की कमी के चलते आंते पूरी तरह से फट गई हैं। वह एमवायएच के इमरजेंसी यूनिट के आईसीयू में पिछले तीन दिनों से भर्ती है। उसे डॉक्टर ने 3 हजार 550 के रुपए कीमत के पांच एल्बुमीन इंजेक्शन लिखे हैं। यह इंजेक्शन मरीज के लिए जीवन रक्षक का काम करते हैं। वैसे तो बिना दीनदयाल कार्ड के महंगे इंजेक्शन मरीजों को अस्पताल से मुफ्त नहीं दिए जाते। दूसरा मिली जानकारी के मुताबिक अस्पताल के ड्रग स्टोर में वर्तमान में यह इंजेक्शन उपलब्ध नहीं है। ऐसे में इलाज कर रहे डॉक्टर्स इस मरीज को बचाने के लिए इन इंजेक्शन को लिए दानदाताओं से मदद मांग रहे हैं। 

क्या गरीब चेहरे और हालत से नहीं दिखता : एमवायएच में पहले यह सिस्टम बना हुआ था कि यदि कोई व्यक्ति यह कह दे कि वह गरीब है और इलाज के लिए उसके पास रुपए नहीं है, तो उसकी इस घोषणा-पत्र के आधार पर मरीज का पूरा इलाज मुफ्त हो जाता था और महंगी दवा भी अस्पताल की ओर से मुफ्त मिल जाया करती थी, लेकिन दीनदयाल योजना के शुरू होने के बाद अब केवल कार्डधारी मरीजों को ही मुफ्त इलाज मिल रहा है, भले ही वह कितना ही गरीब क्यों न हो। क्या गरीब के चेहरे और हालत देखकर उसका मुफ्त इलाज अस्पताल प्रबंधन या डॉक्टर्स नहीं कर सकते? भले ही गरीब व्यक्ति दवा के अभाव में मर जाए, लेकिन उसे दवा मुफ्त तब तक नहीं मिलती, जब तक उसके पास दीनदयाल डायरी न हो। वैसे भी सपना 24 साल की है और उसकी शादी नहीं हुई है। उसकी मां के पासकार्ड भी होता, तो भी वह मुफ्त इलाज के पात्र नहीं होती। 

ऐसा दान किस काम का? : अस्पताल में कायाकल्प के नाम पर लाखों के दान से ईंट-पत्थर की दीवार बना दी गई हैं। लाखों का भुगतान कर मरीजों और स्टाफ की सुरक्षा और सफाई की जा रही हो, लेकिन उसे जो जरूरत है, वह अस्पताल में उपलब्ध ही नहीं है, तो ऐसे दान और ऐसी व्यवस्था की जरूरत क्या। अस्पताल सूत्रों का कहना है कि ऐसे कई मरीज हैं, जो महंगी दवा न खरीद पाने के कारण मर जाते हैं। परिजन बेबसी से उन्हें मरता हुआ देखते हैं। इलाज कर रहे डॉक्टर्स भी हाथ मलते रह जाते हैं, क्योंकि वह भी किस-किस का अपनी जेब से इलाज करें? ऐसे में सवाल उठता नहीं है कि शहर की बड़ी समाजसेवी संस्थाएं आगे आएं और जो समाजसेवी एमवायएच या अन्य अस्पतालों में काम कर रहे हैं, उनको साथ लेकर ऐसे मरीजों को ढुंढे और उनकी मदद करे। भोजन, फ्रूट आदि तो मरीजों को वैसे भी अस्पताल से मुफ्त मिल जाता है। अटेंडर भी कहीं न कहीं से इसका जुगाड़ कर लेगा, लेकिन महंगी जांच और महंगी दवा का इंतजाम वह नहीं कर पाता।

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